Hindi story about True friend and streak value


 सच्चा दोस्त और लकीर का मूल्य 


बात उस समय की थी, जब मैं सातवीं कक्षा में पढता था | मेरे घर

के पास ही मेरे दोस्त रोहन का भी घर था | भोला –भला, सीधा

–सदा सरल स्वभाव का मेरा दोस्त  रोहन | हम दोनों के बीच में  गहरी दोस्ती थीं  |

 रोहन के घर की स्थिति ठीक नहीं थी | पिता मजदूरी का काम

 करते थें | किसी प्रकार घर का गुजर - बसर चल जाता था |  

रोहन खुद्दार  लड़का था। आज तक कभी भी उसने मुझसे कुछ  नहीं माँगा |

 फिर भी मुझसे जो बनता उसे दे दिया करता था  | एक दिन मेरे 

पिता जी ने घर को बदलने की बात कियें, कारण पूछा – तो पता

चला की पिता जी का ऑफिस काफ़ी दूर होने के कारण ऑफिस 

 जाने में काफ़ी समय लग जाता था, इसलिए ऑफिस के पास एक किराये का 

  मकान देख लिए थें और हमलोगों से कहें कि अगले सप्ताह मकान को 


  बदलना हैं | मकान बदलने से मै बिलकुल खुश नहीं था,क्योकि 


मै अपने दोस्त से दूर नहीं रहना चाहता था, किन्तु पिता जी का

फ़ैसला था, इसलिए सभी को मानना पड़ा | जब मैंने रोहन से  मकान

बदलने की बात कहीं तो वो उदास हो गया |

 रोहन कुछ सोंचने के बाद उदास मन से  मुझसे पूछा, क्या ? चाचा जी

तुम्हारा स्कूल भी बदल देंगे ? मैंने कहा - नहीं | यह सुनकर  वह खुश हो

गया | उसने कहा, चलो स्कूल में तो हमलोग साथ में रहेंगे ना, कोई बात नहीं।   

 मैंने उसका चेहरा देखा - मुझे उसके चेहरे पर एक संतोष दिखाई दिया |

धीरे –धीरे समय बीत रहा था | हमदोनों का  स्कूल में साथ में बैठना, साथ में पढ़ना, साथ

में खेलना – कूदना सब कुछ साथ –साथ हो रहा था | रोहन के साथ मेरी एक गहरी

दोस्ती थी | एक आतंरिक लगाव –सा हो गया था | हो भी क्यो नहीं हमारी गहरी दोस्ती जो

थी |  वैसे तो वो प्रतिदिन स्कूल आता था और पढ़ने में भी काफ़ी

अच्छा था | एक दिन रोहन को स्कूल आने में देरी हो गयी | 

जिसके कारण कक्षा अध्यापक ने उसे कुछ देर बाहर खड़ा करके

फिर कक्षा के अंदर भेज दिए | मैंने देरी से  आने का कारण पूछा -

तो उसने  कोई जवाब नहीं दिया | हालांकि वह पहली बार देर से स्कूल

आया था, इसलिए अध्यापक जी ने रोहन को कोई दंड नहीं दिए | 

कुछ दिन और बीतने पर रोहन अक्सर स्कूल देर से आने लगा

और अब कक्षा अध्यापक जी के स्वभाव में भी परिवर्तन हो चुका था |

अध्यापक जी का रोहन के ऊपर गुस्सा जायज़ था | मैंने रोहन से कई बार स्कूल

 देर से आने का कारण पूछा | लेकिन रोहन कुछ बताने को तैयार ना था I मैंने सोचा -

कल  रविवार है और मै कल रोहन के घर जाकर पता लगूँगा कि उसका स्कूल देर से

आने का क्या कारण हैं  |  दूसरे दिन सुबह मैंने मम्मी को रोहन के घर जाने की बात

बताकर  रोहन के घर चला गया | मुझे सुबह - सुबह अपने घर पर देख  कर रोहन बेहद

खुश हुआ | मैंने देखा रोहन स्कूल का गृहकार्य कर रहा था | हमदोनों ने  घर के आगन


 में बैठे – बैठे बाते कर रहे थे | चाची ने बिस्कुट और पानी दिए | मैंने बिस्कुट खाकर


 पानी पिया और बातें  करने लगें  | अचानक मेरी नज़र आगन में जमीन पर खीची



 लकीर पर पड़ी | लकीर काफ़ी गहरी थी | मैंने पूछा - रोहन यह कैसी लकीर खीचें हो ?



 रोहन पहले तो कुछ नहीं बोला | जब मै बार –बार ज़ोर देकर पूछने लगा जब जाकर

जवाब दिया और रोहन का जवाब  सुनकर मुझे आश्चर्य  का ठिकाना नहीं रहा | उसने

कहा – तुम तो जानते हो कि  मेरे घर में  घड़ी नहीं है I पड़ोसी की घड़ी से सुबह नौ बजे

का समय देखकर और सूर्य की रोशनी की परछाई से मिलान करके  आंगन में जमीन

पर एक लकीर खीच दिया और जब सूर्य की रोशनी की परछाई  मेरी खीचीं गई लकीर

के पास आ जाती है | तो मुझे पता चल जाता है की नौ बज गए  है और मै स्कूल जाने

लगता हूँ |  मै अपने दोस्त की बातों को सुनकर स्तम्भ हो गया। मुझे उसकी गरीबी और

लाचारी भरी  बातें सुनकर बहुत दुःख हो रहा था | मैंने पूछा- कि तो फिर कभी – कभी

स्कूल आने में देर क्यों हो जाती  थी | उसने कहा - कभी - कभी मौसम साफ़ ना होने के

कारण समय का पता नहीं चल  पता था | जिसके करना मुझे देर हो जाती थी | रोहन से

मिलकर अब मै अपने घर जा  रहा था | पर पूरे रास्ते मै अपने मित्र की गरीबी और

लाचारी के बारे में सोचता रहा ,



 कि मेरे दोस्त के जीवन में लकीर का कितना मूल्य है | जिसे देखकर वह स्कूल जाता



 है | समय का पता लगाने में उसे कितनी तकलीफ़ होती होगी ? मुझे समझ में नहीं आ



 रहा था कि मै अपने दोस्त की मदद कैसे करू ? क्योकि मेरे पास भी पैसे नहीं



 थे | रात में मैंने अपने माता –पिता  से रोहन की लकीर की सारी कथा कह



 सुनाये | माता – पिता मेरी उदासी को समझ चुके थे, लेकिन कुछ बोले नहीं | दुसरे



 दिन शाम को पिता रोहन के लिए मुझे एक पैकेट दिए और कहे की इस पैकेट को



 जाकर रोहन को दे आओं | रोहन के घर जाकर पैकेट को रोहन को देने लगा | उसने



 पूछा इस पैकेट के अन्दर क्या है ? मैंने कहा - तुम खुद देख लो |रोहन पैकेट खोलकर



 देखा तो उसकी आँखों में आँसू भर आए | उस पैकेट में मेरे पिता ने रोहन के लिए



 दीवार घड़ी दी थी| मैंने उसे अपने गले से लगा लिया और कहा - अब तुम्हे स्कूल आने



 में देरी ना होगी |                

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