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Kavir das ki Saakhi Chapter Explanation

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साखी Saakhi, पाठ व्याख्या - Chapter Explanation 1.ऐसी बाँणी बोलिये , मन का आपा खोइ। अपना तन सीतल करै , औरन कौ सुख होइ।। बाँणी - बोली आपा - अहम् ( अहंकार ) खोइ - त्याग करना सीतल - शीतल ( ठंडा , अच्छा ) औरन - दूसरों को होइ - होना   प्रसंग -: प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ' स्पर्श ' से ली गई है। इस साखी के कवी ' कबीरदास ' जी है। इसमें कबीर ने मीठी बोली बोलने और दूसरों को दुःख न देने की बात कही है व्याख्या -: इसमें कबीरदास जी कहते है कि हमें अपने मन का अहंकार त्याग कर ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जिसमे हमारा अपना तन मन भी सवस्थ रहे और दूसरों को भी कोई कष्ट न हो अर्थात दूसरों को भी सुख प्राप्त हो। 2.कस्तूरी कुंडली बसै , मृग ढूँढै बन माँहि। ऐसैं घटि - घटि राँम है , दुनियां देखै नाँहिं।। कुंडली - नाभि मृग - हिरण घटि घटि - कण कण प्रसंग -:   प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ' स्पर्श ' से ली गई है।...